मध्य प्रदेश लोकायुक्त संगठन Madhya Pradesh Lokayukta की जांच करने वाली विशेष पुलिस स्थापना SPE में करीब ढाई दशक पहले तक अधिकारियों से लेकर निचले स्टाफ तक की पदस्थापना कुछ सालों की गोपनीय चरित्रावली यानी सीआर के आधार पर होती थी। मगर दिग्विजय सरकार के दूसरे कार्यकाल में लोकायुक्त Madhya Pradesh Lokayuktaसे यह अधिकार लेकर डीजीपी विशेष पुलिस स्थापना को दे दिए गए। यह कहा जाता रहा है कि तब से लोकायुक्त विशेष पुलिस स्थापना Lokayukta SPE में पदस्थापना वैसे ही होने लगी जैसे किसी समय परिवहन विभाग में पुलिस की प्रतिनियुक्तियां होती थीं। सिफारिशों के आधार पर लोकायुक्त विशेष पुलिस स्थापना Lokayukta SPE से भ्रष्टाचार के मामलों में जांच करने वाली टीम के उसमें ही शामिल हो जाने के आरोप की चर्चा मीडिया के स्टिंग ऑपरेशन में घेरे में भी आ गई। स्टिंग ऑपरेशन के बाद वहीं हुआ जो होता आया है, छोटे पुलिसकर्मियों को तो सरकार ने बर्खास्त तक कर दिया मगर डीजी लोकायुक्त के दफ्तर के ठीक नीचे जिस एसपी ऑफिस में कथित गड़बड़ियों का खुलासा हुआ वहां पदस्थ एसपी की प्रतिनियुक्ति तक समाप्त नहीं की गई और न ही डीजी DG Madhya Pradesh Lokayukta SPE लोकायुक्त पुलिस से कोई सवाल जवाब ही हुआ। एसपी को विशेष पुलिस स्थापना Lokayukta SPE के दूसरे जिले में तबादला करने की औपचारिकता पूरी की गई। भ्रष्टाचार नियंत्रण की जांच एजेंसी पर भी विजिलेंस सेल से निगरानी का रास्ता अपनाकर मध्य प्रदेश हंसी का पात्र भी बन गया है क्योंकि यह तथाकथित भ्रष्ट सिस्टम के सुधार का उपाय नहीं है। बल्कि जांच एजेंसी के भीतर प्रवेश के दौरान ही ऐसी छलनी लगाई जाना जरूरी है जिससे ऐसे तथाकथित भ्रष्ट अधिकारी-कर्मचारी उसमें जगह ही नहीं पा सकें। देखते हैं आगे इस घटनाक्रम में बड़ी मछलियों पर सरकार क्या एक्शन लेती है और विशेष स्थापना पुलिस में सिफारिश पोस्टिंग बंद होती है या नहीं।
एसीएस का समाचार प्रेम या मक्खनबाजी …. नौकरशाहों के चटखारे
मध्य प्रदेश Madhya Pradesh के मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव CM Dr Mohan Yadav के प्रचार प्रसार के लिए एक बड़े भारी भरकम स्टाफ वाला जनसंपर्क विभाग है जिसमें दो वरिष्ठ आईएएस अधिकारी IAS Officer सचिव स्तर के कमिश्नर CPR मनीष सिंह तो अपर सचिव स्तर के डायरेक्टर DPR अरविंद दुबे पदस्थ हैं। मगर मुख्यमंत्री CM से सीधे जुड़े समाचार हों या उनके रुचि वाली दूसरी खबरें, उन्हें प्रिंट-इलेक्ट्रॉनिक या डिजिटल मीडिया Media तक पहुंचाने में मुख्यमंत्री सचिवालय के आला अधिकारी निजी तौर पर रुचि ले रहे हैं। यह अधिकारी हैं सीएम सचिवालय के प्रमुख नीरज मंडलोई। वे कुछ मीडिया मित्रों को इन दिनों सीएम से जुड़े समाचार व बयानों को व्यक्तिगत रूप से भेजने में विशेष समय दे रहे हैं। मध्य प्रदेश Madhya Pradesh से जुड़े विषयों पर केंद्रीय मंत्रियों के प्रिजेंटेशन हो या मुख्यमंत्री CM का कोई वीडियो बयान, उनकी रुचि के समाचार, मंडलोई जी स्वयं मीडिया से जुड़े मित्रों को भेज रहे हैं। मंडलोई जी के कामकाज की इस शैली की नौकरशाहों के बीच विशेष चर्चा है। नौकरशाह सीएम CM का विशेष ध्यान रखे जाने, जैसे चटखारे लेने वाली टिप्पणियां करने से भी नहीं चूक रहे हैं। कोई इसे मंडलोई जी का समाचार प्रेम बताता है तो कोई कानाफूसी के बीच उनके इस अंदाज को सरकार के मुखिया के करीब बने रहने का तरीका भी कह देता है। वैसे सबका काम करने का अपना अपना तरीका होता है और अब तक सीएम CM सचिवालय के प्रमुख रहने वालों में से अपवादों को छोड़ दें तो शायद ही इस तरह की कार्यशैली को किसी ने अपने कार्यालयीन कामकाज के तरीके में शामिल किया था।
मंत्रियों के स्टाफ की डिमांड….दमखम ऐसा आरोपों से भी बेदाग निकले
यह कहा जाता है कि सरकारों में ज्यादातर मंत्री का स्टाफ उनको चलाता है। इसमें कुछ अपवाद भी होते हैं। मगर प्रायः मंत्रीजी किससे मिलेंगे, क्या काम करना है या किस काम को नहीं करना है, यह स्टाफ तय करता है। यानी मंत्रीजी का मैनेजमेंट अधिकांशतः स्टाफ के हाथ में होता है। जब स्टाफ के खिलाफ कोई शिकायत वायरल होती है तो उसे रफादफा कराने में उनका मैनेजमेंट तेजी से काम करता है। बात मध्य प्रदेश Madhya Pradesh के विंध्य क्षेत्र के एक मंत्री की है जिनके स्टाफ पर कुछ समय पहले महिला ने छेड़छाड़ जैसे गंभीर आरोप लगाए थे। मामला सोशल मीडिया Social Media पर जमकर वायरल हुआ। मंत्रीजी के स्टाफ के सदस्य कुछ दिन तक अंडरग्राउंड रहे और उनके श्रेष्ठ मैनेजमेंट की झलक तब दिखाई दी जब महिला ने Social Media वायरल बयान को न केवल गलत बताया बल्कि मंत्रीजी के स्टाफ मैंबर को अपना भाई तक बना लिया। तो आप जान गए न कि मंत्रीजी के स्टाफ ने क्या डिमांड की होगी और वे ऐसे गंभीर आरोपों में भी मंत्रीजी के स्टाफ सदस्य अपने दमखम के नेटवर्क के सहारे उससे बेदाग होकर निकल भी आए।
पुलिस पर प्रभाव में आने का दाग….फिर एक्शन में पक्षपात
मध्य प्रदेश Madhya Pradesh पुलिस और खासकर भोपाल पुलिस पर कुछ समय से असरदार लोगों के प्रभाव में आकर कार्रवाई करने के आरोप लगे हैं जिनमें कई स्तर पर आलोचनाओं का शिकार भी होना पड़ा है। पूर्व जिला जज गिरिबाला सिंह की बहू ट्विशा शर्मा की मौत के मामले में गिरिबाला व उनके बेटे के खिलाफ एफआईआर, गिरफ्तारी, साक्ष्यों को जुटाने को लेकर भोपाल पुलिस को ऐसे आरोपों से घेरा गया था। इसके बाद भी भोपाल पुलिस ने सबक नहीं लिया। शहर के एक बड़े प्रभावी परिवार के मुखिया व उनकी कंपनी के कर्मचारी के खिलाफ राजस्थान में हुई पुलिस कार्रवाई के भोपाल ट्रांसफर होने पर भी उसी तरह की पुनरावृत्ति हुई। इस मामले में एक्शन लेने वाले पुलिस अफसर को चंद घंटे के भीतर मैदान से हटाकर पीएचक्यू में भेज दिया तो ट्विशा शर्मा के मामले में प्रभाव में आई पुलिस के जिम्मेदार अधिकारियों को अब तक जिले से बाहर तक नहीं किया गया है। तीसरा मामला भेल क्षेत्र से लगे पुलिस थाने में नेता, पत्रकार, पुलिस कर्मचारी के बीच चल रहे विवाद का है जिसमें कई बयान सोशल मीडिया Social Media पर वायरल हो चुके हैं। इनमें न केवल मीडियाकर्मी आरोपों के घेरे में बल्कि पुलिस कर्मचारी भी घेरे में आ गए हैं। इसके बाद भी पुलिस के आला अधिकारी लगता है कि एक्शन लेने में भय खा रहे हैं।
जंगल की चिंता नहीं सर्किल की दौड़….मंत्रालय के टॉप फ्लोर की परिक्रमा
जंगल महकमे में वर्किंग प्लान को गीता की तरह माना जाता है और वनों की अंतरात्मा भी कहा जाता है। आईएफएस अधिकारियों के लिए वर्किंग प्लान में पोस्टिंग पहले कभी अनिवार्य थी मगर इस अनिवार्यता को अधिकारियों ने समाप्त करा लिया। अब युवा पीढ़ी के आईएफएस अधिकारी वर्किगं प्लान की पोस्टिंग में या जाना नहीं चाहते या फिर बीच में ही छोड़ने की कोशिश करने लगते हैं। वर्किंग प्लान जंगल के आगे के दस साल की प्लानिंग होती है जिसमें सर्वे के आधार पर घने जंगलों को कितना औऱ कैसे काटने की अनुमति दी जाए और जहां पेड़ कम हो गए हों वहां किन स्थानों पर पौधों को लगाया जाए। वर्किंग प्लान को तीन साल में पूरा करना होता है मगर 2012 बैच के भोपाल के क्षितिज कुमार, ग्वालियर के लवित भारती, शहडोल के महेंद्र प्रताप सिंह, रीवा के अनुराग कुमार व पन्ना टाइगर रिजर्व के फील्ड डायरेक्टर बृजेंद्र श्रीवास्तव को वर्किंग प्लान के साथ अन्य प्रभार भी दे दिए गए जिससे वर्किंग प्लान के साथ न्याय नहीं हो पा रहा है। वहीं, इसका फायदा ये युवा आईएफएस अधिकारी लेने की कोशिश कर वर्किंग प्लान से मुक्त होकर सर्किल में जाने की फिराक मे हैं। इनका साथ मंत्रालय के टॉप फ्लोर के एक प्रमोटी आईएएस अधिकारी कर रहे हैं। इस काम में इन अधिकारियों के लीडर क्षितिज कुमार बने हैं जिनकी मंत्रालय के टॉप फ्लोर पर मजबूत पकड़ बताई जा रही है। देखना यह है कि मंत्रालय में जंगल की चिंता की जाती है या अफसरों को मनचाही पोस्टिंग मिलती है।
