गिरगिट….नेता नहीं बदलेंगे अपनी विचारधारा
https://www.instagram.com/p/DX6SGPkDOHy/?igsh=OWF2cmNrdHM3Z2ls
मध्य प्रदेश की राजनीति में पर्दे के पीछे नेता के कामकाज की बागडोर संभालने वाले एक जाना माना चेहरा इस बार नेता नहीं विचारधारा के साथ बदलाव करने वाले हैं। यह चेहरा करीब डेढ़ दशक से ज्यादा समय से राष्ट्रीय राजनीतिक दल के नेताओं से जुड़े हैं और दिल्ली से लेकर भोपाल तक इनका जलवा रहा है। परिवहन जैसे महकमे में सेवाएं दे चुके मालवा की माटी से जुड़े इस चेहरे ने अब तक दो नेताओं के कामकाज को देखा है। मगर कुछ समय से वे इन नेताओं की टीम से दूरी बना रहे हैं। मोटिवेशनल स्पीकर से लकेर कॉलमिस्ट और लेखक के रूप में अपनी छवि बनाने की कोशिश कर रहे इन महाश्य ने अपनी विचारधारा को ही बदलने का प्रयास किया है। राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के अनुशांगिक संगठनों से इनकी करीबी बढ़ रही है। जिस तरह गिरगिट रंग बदला है, ये नेता बदलते रहे हैं और अवसरवादी चेहरे की पहचान बन चुके ये अब चमड़ी ही बदलने की फिराक में हैं।
कहां गई…अरबपति परिवार की गले की हड्डी युवती
मध्य प्रदेश के एक अरबपति परिवार का कोरोनाकाल में एक युवती ने नाक में दम कर रखा था। कभी परिवार के सामने शराब की बोतलों को फेंक कर तोड़ फोड़ करती तो कभी बड़ी झील किनारे बने होटल के शुभारंभ कार्यक्रम में हंगामा कर जमीन आसमान एक कर रही थी। परिवार ने भोपाल के एक थाने में उनके ब्लैकमेल करने की शिकायत भी की थी। मकान, आलीशान गाड़ी देने के बाद भी उसका हंगामा बंद करने का सिलसिला बंद नहीं हुआ। बता दें कि वह यह सब उस परिवार के उस युवा सदस्य से शादी रचाना चाहती थी जो उसका मित्र रह चुका था। बाद में जब उसने ब्रेकअप करने की कोशिश की तो युवती ने परिवार का जीना दूभर कर दिया था। कई महीनों तक उसकी गतिविधियों से अरबपति परिवार परेशान रहा मगर अचानक गले की हड्डी युवती गायब हो गई है। पुलिस में हुई शिकायत का क्या हुआ, जांच चल रही है या बंद हो गई, यह अब कौन पूछेगा।
नहीं रहे जलवे….बड़े नेताओं का कद अब कैसा
समय सबका एक सा नहीं होता, यह राजनीति के वर्तमान परिदृश्य को देखने से अच्छी तरह समझा जा सकता है। एक समय जिन नेताओं के जलवे मध्य प्रदेश के लोगों ने देखे थे, आज उनका कद वैसा नहीं दिखाई देता है जो उनके समय में देखा गया। भाजपा की राजनीति मौजूदा दौर में बदल गई है। पहले वरिष्ठता का ध्यान रखा जाता था मगर अब कद बढ़ना या घटना, सबकुछ किसी के हाथ में है। शिवराज सिंह चौहान से लेकर उमा भारती, कैलाश विजयवर्गीय, प्रहलाद पटेल, राकेश सिंह जैसे कई नाम हैं, माना जाता था कि उनके कारण ही भाजपा सत्ता में आई। सीएम चेहरे 2003 में उमा फिर 2008 से लेकर 2018 तक शिवराज रहे और आज उमा संघर्ष कर रहीं तो शिवराज दिल्ली में एक मंत्रालय संभाल रहे। विजयवर्गीय, प्रहलाद और राकेश सिंह का दर्द वे जानते हैं। मंत्री हैं पर विभाग में पूरा कंट्रोल उनके पास नहीं। ऐसे कई और बड़े नेता हैं जो अनुशासन के नाम पर चुप्पी साधे रहते हैं।
पर्दे के पीछे कौन….श्यामला हिल्स अतिक्रमण विरोधी कार्रवाई
मध्य प्रदेश में बेशकीमती जमीनों पर अतिक्रमण कराने और अतिक्रमण विरोधी मुहिम में दशकों से रह रहे परिवारों को बेदखल करने की राजनीति कुछ सरकारों से तेजी से पनपी है। श्यामला हिल्स जैसी बेशकीमती जमीन पर पिछले सप्ताह चली अतिक्रमण विरोधी मुहिम में पांच-छह दशकों से रहने वाले आदिवासी परिवारों को हटाने के लिए पुलिस ने गुरिल्ला ऑपरेशन जैसी तैयारी की थी। इस जमीन को वन विभाग के नाम पर खाली कराया गया है मगर सुनने में यह आ रहा है कि असल में पर्दे के पीछे किसी बड़े पैसे वाली पार्टी की नजर इस पर है। जिस तरह भोपाल के अरेरा हिल्स में माध्यमिक शिक्षा मंडल से लगी बड़ी बस्ती को कुछ दशक पहले मध्य प्रदेश हाउसिंग बोर्ड के लिए खाली कराया गया था। प्रशासन की बड़ी टीम ने उसे खाली कराया मगर आज वहां डीबी सिटी खड़ी है। देखना यह है कि आने वाले दशक में श्यामला हिल्स के आदिवासी मोहल्ले की जमीन का स्वामित्व वन विभाग के पास रहता है या असरदार व्यक्ति या उनसे जुड़े संस्थान के पास जाता है।
फिर चर्चा में आए आशीष अग्रवाल
मध्य प्रदेश में भाजपा जिस अनुशासन के लिए जानी जाती है वह ग्वालियर में इन दोनों गुटीय राजनीति का शिकार दिखाई दे रही है। ग्वालियर पूर्व से भाजपा विधानसभा चुनाव 2028 के लिए दावेदारों के बीच इन दोनों शक्ति प्रदर्शन का सिलसिला जारी है और वह कोई भी ऐसा अवसर नहीं छोड़ना चाहते जिसमें उन्हें अपनी शक्ति दिखाने का मौका मिल रहा हो। अपेक्स बैंक की नवनियुक्त अध्यक्ष महेंद्र सिंह यादव के ग्वालियर पहुंचने पर उनके स्वागत के लिए इस सीट की दो दावेदारों के समर्थकों में जमकर बहस का नजारा रेलवे स्टेशन पर देखने को मिला। हालत यह बन गए कि स्वागत के लिए पहुंचे दूसरे लोग हर फूल लेकर ही खड़े रहे और बीजेपी के मीडिया प्रभारी आशीष अग्रवाल के समर्थक दूसरे दावेदार के समर्थकों के साथ धक्का मुक्की करने लगे। देखना यह है कि विधानसभा चुनाव के पहले ग्वालियर पर विधानसभा सीट के दावेदारों के बीच और क्या परिस्थितियों बनती हैं।
